प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक अर्थ सहित — Sanskrit Shlokas With Hindi Meaning

प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक अर्थ सहित — Sanskrit Shlokas With Hindi Meaning

संस्कृत भाषा विश्व की सबसे पुरानी भाषा है और संस्कृत भाषा का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्व है। संस्कृत भाषा को देव भाषा भी कहा जाता है। ऋषि-मुनियों ने संस्कृत भाषा में कई सारी बातें संस्कृत श्लोको (Sanskrit Shlokas) में लिखी है। तो आइये जानते हैं प्रेरणादायक Sanskrit Shlokas अर्थ सहित।

संस्कृत श्लोक — Sanskrit Shlok

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।

नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।।

अर्थ — व्यक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन आलस्य होता है। व्यक्ति का परिश्रम ही उसका सच्चा मित्र होता है। क्योंकि जब भी मनुष्य परिश्रम करता है तो वह दुखी नहीं होता है और हमेशा खुश ही रहता है।

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:।।

अर्थ — व्यक्ति के मेहनत करने से ही उसके काम पूरे होते हैं। सिर्फ इच्छा करने से उसके काम पूरे नहीं होते। जैसे सोये हुए शेर के मुंह में हिरण स्वयं नहीं आता, उसके लिए शेर को परिश्रम करना पड़ता है।

प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक अर्थ सहित — Sanskrit Shlokas With Hindi Meaning

ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति।

भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम्।।

अर्थ — लेना, देना, खाना, खिलाना, रहस्य बताना और उन्हें सुनना ये सभी 6 प्रेम के लक्षण है।

अनादरो विलम्बश्च वै मुख्यम निष्ठुर वचनम।

पश्चतपश्च पञ्चापि दानस्य दूषणानि च।।

अर्थ — अपमान करके देना, मुंह फेर कर देना, देरी से देना, कठोर वचन बोलकर देना और देने के बाद पछ्चाताप होना। ये सभी 5 क्रियाएं दान को दूषित कर देती है।

वाणी रसवती यस्य,यस्य श्रमवती क्रिया।

लक्ष्मी : दानवती यस्य,सफलं तस्य जीवितं।।

अर्थ — जिस मनुष्य की वाणी मीठी हो, जिसका काम परिश्रम से भरा हो, जिसका धन दान करने में प्रयुक्त हो, उसका जीवन सफ़ल है।

यस्तु संचरते देशान् यस्तु सेवेत पण्डितान्।

तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि।।

अर्थ — जो व्यक्ति भिन्न-भिन्न देशों में यात्रा करता है और विद्वानों से सम्बन्ध रखता है। उस व्यक्ति की बुध्दि उसी तरह होती है जैसे तेल की एक बूंद पूरे पानी में फैलती है।

प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक अर्थ सहित — Sanskrit Shlokas With Hindi Meaning

श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन, दानेन पाणिर्न तु कंकणेन।

विभाति कायः करुणापराणां, परोपकारैर्न तु चन्दनेन।।

अर्थ — कानों में कुंडल पहन लेने से शोभा नहीं बढ़ती, अपितु ज्ञान की बातें सुनने से होती है। हाथों की सुन्दरता कंगन पहनने से नहीं होती बल्कि दान देने से होती है। सज्जनों का शरीर भी चन्दन से नहीं बल्कि परहित में किये गये कार्यों से शोभायमान होता है।

प्रदोषे दीपक : चन्द्र:,प्रभाते दीपक:रवि:।

त्रैलोक्ये दीपक:धर्म:,सुपुत्र: कुलदीपक:।।

अर्थ — संध्या काल में चन्द्रमा दीपक है, प्रभात काल में सूर्य दीपक है, तीनों लोकों में धर्म दीपक है और सुपुत्र कूल का दीपक है।

अश्वस्य भूषणं वेगो मत्तं स्याद् गजभूषणं।

चातुर्यम् भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणं।।

अर्थ — घोड़े की शोभा उसके वेग से होती है और हाथी की शोभा उसकी मदमस्त चाल से होती है।नारियों की शोभा उनकी विभिन्न कार्यों में दक्षता के कारण और पुरुषों की उनकी उद्योगशीलता के कारण होती है।

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।

एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति।।

अर्थ — जैसे एक पहिये से रथ नहीं चल सकता। ठीक उसी प्रकार बिना पुरुषार्थ के भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता है।

प्रियवाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।

तस्मात तदैव वक्तव्यम वचने का दरिद्रता।।

अर्थ — प्रिय वाक्य बोलने से सभी जीव संतुष्ट हो जाते हैं, अतः प्रिय वचन ही बोलने चाहिए। ऐसे वचन बोलने में कंजूसी कैसी।

प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक अर्थ सहित — Sanskrit Shlokas With Hindi Meaning

कृते प्रतिकृतं कुर्यात्ताडिते प्रतिताडितम्।

करणेन च तेनैव चुम्बिते प्रतिचुम्बितम्।।

अर्थ — हर कार्रवाही के लिए एक जवाबी कार्रवाही होनी चाहिए। हर प्रहार के लिए एक प्रति-प्रहार और उसी तर्क से हर चुम्बन के लिए एक जवाबी चुम्बन।

परो अपि हितवान् बन्धुः अपि अहितः परः।

अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम्।।

अर्थ — यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी मदद करें तो उसको अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दें और अपने परिवार का सदस्य ही आपको नुकसान देना शुरू हो जाये तो उसे महत्व देना बंद कर दें। ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमार हो जाये तो वह हमें तकलीफ पहुंचती है। जबकि जंगल में उगी हुई औषधी हमारे लिए लाभकारी होती है।

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