गृहस्थी पर संस्कृत श्लोक हिंदी में Part 4

गृहस्थी पर संस्कृत श्लोक हिंदी में Part 4 top sanskrit shlok

  • त्यागाय समृतार्थानां सत्याय मिभाषिणाम् ।
  • यशसे विजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिनाम् ॥
  • सत्पात्र को दान देने के लिए धन इकट्ठा करनेवाले, यश के लिए विजय चाहनेवाले, सत्य के लिए मितभाषी और संतान के लिए विवाह करनेवाले, वे कहते हैं कि प्रजानार्थ गृहसंस्था थी ।
  • यासां स्तन्यं त्वया पीतं यासां जातोऽसि योनितः ।
  • तासु मूर्खतम स्त्रीषु पशुद्रमसे कथम् ॥
  • जिसका तूने दूध पिया और जिसकी योनि से तू उत्पन्न हुआ, उन्हीं स्त्रीयों के साथ तू पशु समान आचरण करता है, (ऐसा) तुज़े नहीं लगता ?
  • सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्वा भव ।
  • ननोन्दरे सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवषु ॥
  • समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ।
  • समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥
  • हे वधू ! तू श्वसुर, सास, ननद और देवरों की साम्राज्ञी (महारानी) के सदृश हो ।
  • तुम्हारा संकल्प एक समान हो, जिससे तुम्हारे परस्पर कार्य पूर्णरुप से संगठित हो ।
  • स्त्रीणां हि साहचर्याध्द्ववति चेतांसि भर्तृसदृशानि ।
  • मधुरापि हि मूर्च्छयेत् विपविटपिसमाश्रिता वल्ली ॥
  • साहचर्य के कारण स्त्री का अन्तःकरण पति के जैसा बनता है; जिस प्रकार लता मधुर होते हुए भी विषवृक्ष को लिपटे रहने से विषैली बन जाती है ।
  • एकेनापि सुपुत्रेण सिंही स्वपिति निर्भयम् ।
  • सहैव दशभिः पुत्रैर्भारं वहति रासभी ॥
  • शेरनी का एक पुत्र हो तो (भी) वह निर्भयता से सो जाती है; पर दस पुत्र होने पर भी गदर्भी (गधी) भार हि उठाती है ।
  • विद्यते कलहो यत्र गृहे नित्यमकारणः ।
  • तद्गृहं जीवितं वाञ्छन् दूरतः परिवर्जयेत् ॥
  • ज़िंदा रहने की इच्छा रखनेवाले ने, जिस घर में नित्य अकारण कलह होता हो, उस घर का दूर से हि त्याग करना चाहिए ।
गृहस्थी पर संस्कृत श्लोक हिंदी में Part 3
  • कुले कलङ्कः कवले कदन्नता
  • सुतः कुबुद्धिः भवने दरिद्रता ।
  • रुजः शरीरे कलहप्रिया प्रिया
  • गृहागमे दुर्गतयः षडेते ॥
  • कुल में कलंक, निवाले में बेस्वाद, दृष्टबुद्धि पुत्र, घर में दरिद्रता, शरीर में रोग, और कलहप्रिय पत्नी – ये छे दुर्गतिकारक है ।
  • प्राणान् न हिंस्यात् न पिबेच्च मद्यं
  • वदेच्च सत्यं न हरेत्परार्थम् ।
  • परस्य भार्यां मनसाऽपि नेच्छेत्
  • स्वर्गं यदीच्छेत् गृहवत् प्रवेष्टुम् ॥
  • यदि स्वर्ग में घर की तरह सरलता से प्रयास करने की इच्छा हो, तो प्राण की हिंसा नहीं करना, मद्यपान नहीं करना, सत्य बोलना, पराया धन न लेना, और परायी स्त्री का मन से भी विचार न करना ।
  • आनन्दरुपा तरुणी नताङ्गी
  • सद्धर्म संसादन सृष्टि रुपा ।
  • कामार्थदा यस्य गृहे न नारी
  • वृथागतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
  • जिस घर में आनंद देनेवाली, तरुण, सुंदर, सत् धर्मचारिणी, काम और अर्थ देनेवाली स्त्री नहीं, उस इन्सान का जीवन व्यर्थ है ।
  • सती सुरुपा सुभगा विनीता
  • प्रेमाभिरामा सरल स्वभावा ।
  • सदा सदाचार विचार दक्षा
  • सा प्राप्यते पुण्य वशेन पत्नी ॥
  • सती, व्यरुपवान, भाग्यवान, संस्कारी, प्रेम करनेवाली, सरल स्वभाववाली, सदा सदाचरण में तत्पर ऐसी पत्नी इन्सान को पुण्य से हि मिलती है ।
  • दुष्ट पर संस्कृत श्लोक हिंदी में
  • चरित्र पर संस्कृत श्लोक हिंदी में
  • What is hatha yoga? hatha yoga definition

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published.