ज्ञान पर संस्कृत श्लोक part3

Gyan shlok in hindi ज्ञान पर संस्कृत श्लोक part3
Gyan shlok in hindi ज्ञान पर संस्कृत श्लोक part3

Gyan shlok in hindi ज्ञान पर संस्कृत श्लोक part3

  • तेनाधीतं श्रुतं तेन सर्वमनुष्ठितम् ।
  • येनाशाः पृष्ठतः कृत्वा नैराश्यमवलंबितम् ॥
  • जिसने आशा को पीछे छोड दिया है और निष्कामता का अवलंबन किया है, वही सब पढा है, उसीने सब सुना है और उसीने सब का अनुष्ठान किया है (ऐसा समजो) ।
  • मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत् ।
  • आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पश्यति ॥
  • जो दूसरे की पत्नी को मातृवत् देखता है, दूसरे के द्रव्य को मिट्टी के पिंड भाँति देखता है, और भूत मात्र को आत्मवत् (अपने समान) देखता है, वही सच्चा देखता है ।
  • शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
  • ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥
  • अन्तःकरण का निग्रह, इंद्रियों का दमन, तप, बाह्य-भीतर की शुद्धि, क्षमाभाव, ऋजुभाव, ज्ञान-विज्ञान में आस्था रखना और उन्हें प्रस्थापित करना – ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म है ।
  • अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
  • सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥
  • हे पार्थ ! तमोगुण से व्याप्त बुद्धि अधर्म को भी यह धर्म है, ऐसा समज बैठती है; और वैसे हि दूसरी हर बात को भी विपरीत समजती है, वह बुद्धि तामसी है ।
  • यथा धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
  • अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥
  • हे पार्थ ! इन्सान जिस बुद्धि से धर्म-अधर्म को, कर्तव्य-अकर्तव्य को यथार्थरुप से नहीं जान सकती, वह बुद्धि राजसी है ।
  • अभय पर संस्कृत श्लोक हिन्दी में
  • प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
  • बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
  • हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग को, कर्तव्य-अकर्तव्य को, भय-अभय को, तथा बंधन-मोक्ष को यथार्थरुप से जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है ।
  • आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
  • बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।
  • इन्द्रियाणी हृयानाहुर्विषयास्तेषु गोचरान् ।
  • आत्मा को रथ का स्वामी समज; शरीर को रथ समज; बुद्धि को सारथि समज; मन लगाम है, इन्द्रियाँ घोडे हैं, और विषय घोडे को चरने के मार्ग है ।
Gyan shlok in hindi ज्ञान पर संस्कृत श्लोक
  • असतो मा सत् गमय ।
  • तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
  • मृत्योर्माऽमृतं गमय ।
  • मानवी जीवन का प्रवास असत् से सत् की ओर, अँधकार से प्रकाश की ओर, और मृत्यु से अमरत्व की ओर हो
  • ॐमे बंदुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः ।
  • कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः ॥
  • समग्र विश्व ॐ में समा जाता है । इच्छा, सिद्धि और मोक्षप्राप्ति सभी जिसमें समाविष्ट है, योगी जिसका ध्यान करते हैं, उस ॐकार को नमस्कार ।
  • ओंकारः सर्वमंत्रणामुत्तमः परिकीर्तितः ।
  • ओंकारेण प्लवैनैव संसाराब्धिंतरिष्यसि ॥
  • सभी मंत्रो में ओंकार हि उत्तम मंत्र है । ओंकाररुप नौका से हि संसार सागर पार होगा ।

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