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गीता के श्लोक

भगवद गीता के 50 संक्षिप्त श्लोक और उनके हिंदी अर्थ

By SanskritShlok.com
25/09/2026 4 Min Read
Comments Off on भगवद गीता के 50 संक्षिप्त श्लोक और उनके हिंदी अर्थ

भगवद गीता के 50 संक्षिप्त श्लोक और उनके हिंदी अर्थ

  1. धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
    मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥

    अर्थ: धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित होकर, युद्ध के लिए तत्पर कौरव और पाण्डव ने क्या किया, हे संजय?
  2. नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
    उभयोरपि दृष्टान्तः त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥

    अर्थ: जो असत्य है, उसकी कोई अस्तित्व नहीं; और जो सत्य है, उसका कभी अभाव नहीं होता। इस सिद्धांत को ज्ञानी जानते हैं।
  3. योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
    सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

    अर्थ: हे धनञ्जय, योग में स्थित रहकर अपने कर्मों को करें, राग-द्वेष को त्यागकर। सफलता और असफलता में समानता को योग कहा जाता है।
  4. अनन्यास्चिन्तयन्तो मां यजन्ति सुमनसाः।
    तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

    अर्थ: जो लोग मेरी अनन्य भक्ति से मेरी पूजा करते हैं, उनके लिए मैं योग और सम्पत्ति की रक्षा करता हूँ।
  5. अशान्तस्य कुतः सुखं।
    अर्थ: अशांत व्यक्ति को सुख कैसे मिल सकता है?
  6. न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
    यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥

    अर्थ: देहधारी व्यक्ति द्वारा सभी कर्मों का त्याग करना असंभव है; जो कर्मफल का त्याग करता है, वह त्यागी कहलाता है।
  7. ज्ञानं परमं दिव्यं, ज्ञानं योगमयीं सदा।
    अर्थ: ज्ञान परम दिव्य है और यह योगमयी होती है।
  8. अधिकारीभूतं साध्यम्, सर्वान्मुक्तिप्रदायकम्।
    अर्थ: जो सबको मुक्ति प्रदान करता है, वही साध्य होता है।
  9. शरीरं केवलं कर्माणि, आत्मा केवलं ज्ञानम्।
    अर्थ: शरीर कर्मों का केंद्र है, जबकि आत्मा ज्ञान का केंद्र है।
  10. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
    अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म में है, फलों में नहीं।
  11. न जातु मनुष्यों वियोगः कर्तव्यस्य कर्मणः।
    अर्थ: मानव कभी भी अपने कर्तव्य कर्म से विमुक्त नहीं हो सकता।
  12. न आत्मनं प्रियं यास्यति, कर्मनिरोधनं हि।
    अर्थ: आत्मा को प्रिय नहीं मानते हुए कर्म का पालन करना सही है।
  13. अशान्ति: स्वधर्मे स्थितं, अहिंसया परं सुखम्।
    अर्थ: स्वधर्म में स्थिर रहकर अशांति को दूर करें, अहिंसा से परम सुख प्राप्त करें।
  14. न ते सम्पदसस्त्व्यक्ताः, सम्पत्ति: संसृतात्मिका।
    अर्थ: जो सम्पत्ति अज्ञात है, वह संसारिक नहीं है।
  15. संसारविभवस्यैव, धर्मार्थो न विस्मृतः।
    अर्थ: संसारिक समृद्धि की ओर धर्म और अर्थ की ओर ध्यान दें।
  16. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
    अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म में है, फलों में नहीं।
  17. न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
    अर्थ: देहधारी व्यक्ति द्वारा सभी कर्मों का त्याग करना असंभव है।
  18. सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
    अर्थ: सुख और दुःख, लाभ और हानि, विजय और पराजय को समान मानकर कर्म करो।
  19. न जायते म्रियते वा कदाचि, न्नायं भूत्वा।
    अर्थ: आत्मा न तो जन्म लेती है, न मरती है; वह सदा अविनाशी है।
  20. यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
    अर्थ: जो मुझमें सब कुछ देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, वह ज्ञानी है।
  21. अक्षरं परमं व्याप्तं, सर्वस्याधितिश्वरम्।
    अर्थ: अक्षर परमात्मा सभी वस्तुओं में व्याप्त है और सर्वशक्तिमान है।
  22. स्वधर्मे निधनं श्रेयो, परधर्मो भयावहः।
    अर्थ: अपने धर्म की मृत्यु ही श्रेणी होती है; दूसरों के धर्म को अपनाना भयावह है।
  23. विद्या विनयेन शोभते, अद्वितीयं च भारत।
    अर्थ: विद्या विनय के साथ सजती है, और यह अद्वितीय है, हे भारत।
  24. न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं प्रवर्धते।
    अर्थ: कर्मों की अनदेखी से निष्कर्मता नहीं बढ़ती है।
  25. सर्वकर्माणि मनसा संन्यासः कृतं हि।
    अर्थ: सभी कर्मों का मानसिक संन्यास ही सही है।
  26. अहिंसां परमं पुण्यम्, अहिंसा परमा गति:।
    अर्थ: अहिंसा सबसे बड़ा पुण्य है; अहिंसा परम लक्ष्य है।
  27. आत्मनं साक्षिणं ज्ञात्वा, कर्माणि न त्यजेत्।
    अर्थ: आत्मा को साक्षी मानकर कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए।
  28. शरीरमध्यस्थोऽयं, आत्मा हि शरीरविपर्ययः।
    अर्थ: आत्मा शरीर के भीतर स्थित है, और शरीर की उलझनों से मुक्त है।
  29. सन्तुष्टोऽयं योगी नित्यम्, कर्मण्येव साधकः।
    अर्थ: संतुष्ट योगी हमेशा कर्मों में संलग्न रहता है।
  30. विद्या दानं परं पुण्यम्, विद्या परं शान्ति।
    अर्थ: विद्या सबसे बड़ा पुण्य है; विद्या से शांति प्राप्त होती है।
  31. कर्मसंगेन मुक्तः, कर्मणि च अनुष्ठितम्।
    अर्थ: कर्म से संलग्न होकर मुक्ति प्राप्त होती है, और कर्म का पालन करना आवश्यक है।
  32. न योगभ्रम निश्चेता, कर्मफलसमोऽमितः।
    अर्थ: योग में भ्रम न हो, कर्मफल समान रूप से प्राप्त हो।
  33. आत्मनं शुद्धकर्माणि, सर्वसिद्धिं साधयेत्।
    अर्थ: आत्मा को शुद्ध कर्मों से सम्पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है।
  34. मोहात्संयुक्तमनसः, मुमुक्षुः शरणं गत्वा।
    अर्थ: मोह में संलग्न मन वाला व्यक्ति मुक्ति की खोज करता है।
  35. न विज्ञानं न च धर्मं, ज्ञानं युक्तिरुपलब्धम्।
    अर्थ: ज्ञान और धर्म दोनों को समर्पित करना आवश्यक है।
  36. न हि कर्माणि पूर्णानि, अज्ञानवशम् प्राप्ति।
    अर्थ: पूर्ण कर्म अज्ञान के प्रभाव से प्राप्त होते हैं।
  37. सदा प्रज्ञात्मिका चिता, परं धन्यं च ज्ञानम्।
    अर्थ: हमेशा प्रज्ञा में स्थित मन, ज्ञान को धन्य बनाता है।
  38. न हि कर्मसंगत्यागं, सर्वसिद्धिरुपलब्धम्।
    अर्थ: कर्म की संगति का त्याग पूर्ण सफलता को प्राप्त करता है।
  39. कर्मण्येवाधिकारस्ते, कर्मफलस्य न हेतुः।
    अर्थ: केवल कर्म में अधिकार है, कर्मफल में नहीं।
  40. योगनिष्ठः सदा कर्म, मोक्षमार्गे कृतं।
    अर्थ: योग में निष्ठा रखने वाला व्यक्ति मोक्षमार्ग पर चलता है।
  41. सर्वेषां च हितार्थः, कर्मसिद्धिः सदा प्रियः।
    अर्थ: सभी के हित के लिए कर्म की सिद्धि प्रिय होती है।
  42. सत्यं ब्रूयात्पृथिव्यां, सम्यग्वेदितुमेव।
    अर्थ: सत्य बोलना पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ है; इसे सही रूप से समझना आवश्यक है।
  43. सदा ज्ञानयुक्तः सदा, कर्मपथे सदा स्थितः।
    अर्थ: हमेशा ज्ञानयुक्त रहकर कर्मपथ पर स्थित रहना चाहिए।
  44. शान्ति: सर्वभूतानां, निर्वाणं च समाश्रयम्।
    अर्थ: शांति सभी प्राणियों के लिए आवश्यक है; निर्वाण प्राप्ति के लिए शांति है।
  45. योगी चित्तस्वरूपः, ज्ञानं सदा भूतलम्।
    अर्थ: योगी का चित्त स्वभाव से ज्ञानी होता है; ज्ञान धरती पर सदा है।
  46. अज्ञानवशे कार्याणि, कर्मविपरीतमानम्।
    अर्थ: अज्ञान के प्रभाव से कर्म विपरीत होता है।
  47. धर्मे स्थिता सदा शान्तः, कर्मसिद्धिः सदा।
    अर्थ: धर्म में स्थिर व्यक्ति हमेशा शांति में रहता है, और कर्म की सिद्धि प्राप्त होती है।
  48. सदा स्वधर्मे स्थितं, कर्माणि सदा प्रियं।
    अर्थ: अपने धर्म में स्थिर रहना और कर्मों को प्रिय मानना चाहिए।
  49. वेदवेदान्तपंथानां, सर्वं सत्यं च शाश्वतं।
    अर्थ: वेद और वेदांत के मार्ग पर सभी सत्य और शाश्वत हैं।
  50. अभय पर संस्कृत श्लोक हिन्दी में
  51. दया पर संस्कृत श्लोक हिंदी में
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