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दया पर संस्कृत श्लोक हिंदी में sanskrit shlok
दया श्लोक

दया पर संस्कृत श्लोक हिंदी में

By SanskritShlok.com
18/09/2026 2 Min Read
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  • संसारे मानुष्यं सारं मानुष्ये च कौलीन्यम् ।
  • कौलिन्ये धर्मित्वं धर्मित्वे चापि सदयत्वम् ॥

संसार में मनुष्यत्व, मनुष्यत्व में खानदानी, खानदानी में धर्मिष्टत्व, और धर्मिष्टत्व में सदयत्व सार (रुप) है ।

  • दयां विना देव गुरुक्रमार्चाः
  • तपांसि सर्वेन्द्रिययन्त्रणानि
  • दानानि शास्त्राध्ययनानि सर्वं
  • सैन्यं गतस्वामि यथा तथैव ॥

देव और गुरुपूजा, तप, सर्वइंद्रियदमन, दान और शास्त्राध्ययन – ये सब क्रिया दया के बगैर वैसे हैं, जैसी कि सेनापति बगैर का सैन्य ।

  • न सा दीक्षा न सा भिक्षा न तद्दानं न तत्तपः ।
  • न तद् ध्यानं न तद् मौनं दया यत्र न विद्यते ॥
  • दया के बगैर दीक्षा, भिक्षा, दान, तप, ध्यान, और मौन सब निरर्थक है ।
  • सर्वे वेदा न तत् कुर्युः सर्वे यज्ञाश्च भारत ।
  • सर्वे तीर्थाभिषेकाश्च तत् कुर्यात् प्राणिनां दया ॥

हे भारत ! सब वेद, सब यज्ञ, सब तीर्थ, सब अभिषेक – जो नहि कर सकता है, वह (भी) प्राणियों पर दया तो कर हि सकता है ।

  • दयाहीनं निष्फलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र हि ।
  • एते वेदा अवेदाः स्यु र्दया यत्र न विद्यते ॥

दयाहीन काम निष्फल है, उस में धर्म नहि । जहाँ दया न हो, वहाँ वेद भी अवेद बनते हैं ।

  • अहिंसा लक्षणो धर्मोऽधर्मश्च प्राणिनां वधः ।
  • तस्मात् धर्मार्थिभिः लोकैः कर्तव्या प्राणिनां दया ॥
  • visit: बुद्धिमान पर संस्कृत श्लोक हिंदी में

धर्म का लक्षण अहिंसा है, और प्राणियों का वध अधर्म है । अर्थात् धर्म की इच्छावाले ने प्राणियों पर दया करनी चाहिए ।

  • दयाङ्गना सदा सेव्या सर्वकामफलप्रदा ।
  • सेवितासौ करोत्याशु मानसं करुणामयम् ॥

सब इच्छित फल देनेवाली दयांगना का सेवन करना चाहिए । यदि सेवन किया जाय तो तुरंत हि वह मन को करुणामय बनाता है ।

  • लावण्यरहितं रुपं विद्यया वर्जितं वपुः ।
  • जलत्यक्तं सरो भाति नैव धर्मो दयां विना ॥

लावण्यरहित रुप, विद्यारहित शरीर, जलरहित तालाब शोभा नहि देते । उसी प्रकार दयारहित धर्म भी शोभा नहि देता ।

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  • न च विद्यासमो बन्धुः न च व्याधिसमो रिपुः ।
  • न चापत्यसमो स्नेहः न च धर्मो दयापरः ॥

विद्या जैसा बंधु नहि, व्याधि जैसा कोई शत्रु नहि, पुत्र जैसा स्नेह नहि, और दया से श्रेष्ठ कोई धर्म नहि ।

  • धर्मो जीवदयातुल्यो न क्वापि जगतीतले ।
  • तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कार्या जीवदयाऽङ्गिभिः ॥

इस दुनिया में जीवदया के तुल्य धर्म इतर कहीं भी नहि । अर्थात् आपने सर्व प्रयत्न द्वारा जीवदया करनी चाहिए ।

How to Meditate: A Comprehensive Guide for Beginners and Beyond

भक्तामर स्तोत्र Sanskrit Shlok With Hindi

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