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ज्ञान पर संस्कृत श्लोक Gyan shlok in hindi
ज्ञान श्लोक

ज्ञान पर संस्कृत श्लोक Gyan shlok in hindi

By SanskritShlok.com
18/09/2026 2 Min Read
4

ज्ञान पर संस्कृत श्लोक Gyan shlok in hindi

  • अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतो मुखम् ।
  • अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥
  • अल्पाक्षरता, असंदिग्धता, साररुप, सामान्य सिद्धांत, निरर्थक शब्द का अभाव, और दोषरहितत्व – ये छे ‘सूत्र’ के लक्षण कहे गये हैं ।
  • शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दसामिति ।
  • ज्योतिषामयनं चैव षडंगो वेद उच्यते ॥
  • शिक्षा (उच्चार शास्त्र), कल्पसूत्र, व्याकरण (शब्द/व्युत्पत्ति शास्त्र), निरुक्त (कोश), छन्द (वृत्त), और ज्योतिष (समय/खगोल शास्त्र) – ये छे वेदांग कहे गये हैं ।
  • सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।
  • वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥
  • सर्ग (उत्पत्ति), प्रतिसर्ग (लय), पुनरुत्पत्ति, मन्वन्तर (अलग मनु से शुरु होनेवाला काल), और वंशानुचरित (कथाएँ) ये पुराण के पाँच लक्षण हैं ।
  • Ashtanga yoga-Yoga Sutras of Patanjali
  • Gayatri Mantra Supreme mantra of the universe from Vedas
  • विषययोगानन्दौ द्वावद्वैतानन्द एव च ।
  • विदेहानन्दो विख्यातो ब्रह्मानन्दश्च पञ्चमः ॥
  • विषयानंद, योगानंद, अद्वैतानंद, विदेहानंद, और ब्रह्मानंद, ऐसे पाँच प्रकार के आनंद हैं ।
  • ग्रन्थार्थस्य परिज्ञानं तात्पर्यार्थ निरुपणम् ।
  • आद्यन्तमध्य व्याख्यान शक्तिः शास्त्र विदो गुणाः ॥
  • ग्रंथ का संपूर्ण ज्ञान, तात्पर्य निरुपण करने की समज, और ग्रंथ के किसी भी भाग पर विवेचन करने की शक्ति – ये शास्त्रविद् के गुण है ।
ज्ञान श्लोक Gyan shlok in hindi
  • ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम् ।
  • अनुभवाख्यं द्वितीयं तुं ज्ञानं तदुर्लभं नृप ॥
  • हे राजा ! ज्ञान दो प्रकार के होते हैं; एक तो स्मृतिजन्य शाब्दिक ज्ञान, और दूसरा अनुभवजन्य ज्ञान जो अत्यंत दुर्लभ है ।
  • बालः पश्यति लिङ्गं मध्यम बुद्धि र्विचारयति वृत्तम् ।
  • आगम तत्त्वं तु बुधः परीक्षते सर्वयत्नेन ॥
  • जो बाह्य चिह्नों को देखता है, वह बालबुद्धि का है; जो वृत्ति का विचार करता है, वह मध्यम बुद्धि का है; और जो सर्वयत्न से आगम तत्त्व की परीक्षा करता है, वह बुध/ज्ञानी है ।
  • न स्वर्गो वाऽपवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिकः । (gyan shlok)
  • नैव वर्णाश्रमादीनां क्रिया च फलदायिका ॥
  • स्वर्ग, मोक्ष, आत्मा, परलोक – ये कुछ भी नहीं है । वर्णाश्रम, या कर्मफल इत्यादि भी सत्य नहीं । (नास्तिक मत)
  • पञ्चभूतात्मकं वस्तु प्रत्यक्षं च प्रमाणकम् ।
  • नास्तिकानां मते नान्यदात्माऽमुत्र शुभाशुभम् ॥
  • प्रत्यक्ष प्रमाण हि प्रमाण है; पञ्चभूतात्मक देह और सृष्टि हि आत्मा है, अन्य नहीं । नास्तिकों के मतानुसार शुभ-अशुभ भुगतना पडता है, ऐसा भी नहीं ।
  • लोकायता वदन्त्येवं नास्ति देवो न निवृत्तिः ।(gyan shlok)
  • धर्माधर्मौ न विद्यते न फलं पुण्यपापयोः ॥
  • लोकायत (नास्तिक वर्ग) लोग ऐसा कहते हैं कि देव या मुक्ति जैसा कुछ नहीं है; धर्म-अधर्म नहीं है; पाप-पुण्य का फल होता है, ऐसा भी मानने की आवश्यकता नहीं ।
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  • ऐसा गृहस्थाश्रम धन्य है गृहस्थी पर संस्कृत श्लोक हिंदी में Part 5
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