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Sanskrit Shlokas with Hindi Meaning

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Gyan shlok top sanskrit shlok
ज्ञान श्लोक

Sanskrit Shlok On Gyan in hindi

By SanskritShlok.com
02/10/2026 2 Min Read
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Gyan shlok top sanskrit shlok संसारसागर में जन्म का, बूढापे का, और मृत्यु का दुःख बार आता है, इस लिए (हे मानव !), “जाग, जाग

  • न जातु कामः कामानुपभोगेन शाम्यति ।
  • हविषा कृष्णवत्मैर्व भुय एवाभिवर्धते ॥

जैसे अग्नि में घी डालने से वह अधिक प्रज्वलित होती है, वैसे भोग भोगने से कामना शांत नहीं होती, उल्टे प्रज्वलित होती है ।

  • आशा हि लोकान् बध्नाति कर्मणा बहुचिन्तया ।
  • आयुः क्षयं न जानाति तस्मात् जागृहि ॥

बडी चिंता कराके, कर्मो द्वारा आशा इन्सान को बंधन में डालती है । इससे खुद के आयुष्य का क्षय हो रहा है, उसका उसे भान नहीं रहेता; इस लिए “जागृत हो, जागृत हो ।”

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  • Gyan shlok in hindi ज्ञान पर संस्कृत श्लोक next part

Gyan shlok top sanskrit shlok

  • एकः शत्रु र्न द्वितीयोऽस्ति शत्रुः ।
  • अज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् ॥

हे राजन् ! इन्सान का एक हि शत्रु है, अन्य कोई नहीं; वह है अज्ञान ।

  • जन्मदुःखं जरादुःखं मृत्युदुःखं पुनः ।
  • संसार सागरे दुःखं तस्मात् जागृहि ॥

संसारसागर में जन्म का, बूढापे का, और मृत्यु का दुःख बार आता है, इस लिए (हे मानव !), “जाग, जाग !”

  • न जातु कामः कामानुपभोगेन शाम्यति ।
  • हविषा कृष्णवत्मैर्व भुय एवाभिवर्धते ॥

जैसे अग्नि में घी डालने से वह अधिक प्रज्वलित होती है, वैसे भोग भोगने से कामना शांत नहीं होती, उल्टे प्रज्वलित होती है ।

  • आशा हि लोकान् बध्नाति कर्मणा बहुचिन्तया ।
  • आयुः क्षयं न जानाति तस्मात् जागृहि ॥

बडी चिंता कराके, कर्मो द्वारा आशा इन्सान को बंधन में डालती है । इससे खुद के आयुष्य का क्षय हो रहा है, उसका उसे भान नहीं रहेता; इस लिए “जागृत हो, जागृत हो ।”

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Gyan shlok top sanskrit shlok

  • एकः शत्रु र्न द्वितीयोऽस्ति शत्रुः ।
  • अज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् ॥

हे राजन् ! इन्सान का एक हि शत्रु है, अन्य कोई नहीं; वह है अज्ञान ।

  • जन्मदुःखं जरादुःखं मृत्युदुःखं पुनः ।
  • संसार सागरे दुःखं तस्मात् जागृहि ॥

संसारसागर में जन्म का, बूढापे का, और मृत्यु का दुःख बार आता है, इस लिए (हे मानव !), “जाग, जाग !”

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