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Sanskrit Shlokas with Hindi Meaning

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दुर्जन पर संस्कृत श्लोक हिंदी में Top Sanskrit Shlok
दुर्जन श्लोक

दुर्जन पर संस्कृत श्लोक हिंदी में Top Sanskrit Shlok

By SanskritShlok.com
25/09/2026 2 Min Read
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  • बोधितोऽपि बहु सूक्तिविस्तरैः
  • किं खलो जगति सज्जनो भवेत् ।
  • स्नापितोऽपि बहुशो नदीजलैः
  • गर्दभः किमु हयो भवेत् कचित् ॥

अच्छे वचनों के उपदेश देने से क्या इस दुनिया में दुष्ट मानव सज्जन हो जायेंगे ? नदी के पानी से बार स्नान कराने के बावजुद क्या गधा कभी घोडा बन पायेगा ?

  • बहति विषधरान् पटीरजन्मा
  • शिरसि मषीपटलं दधाति दीपः ।
  • विधुरपि भकजतेतरां कलंकम्
  • पिशुनजनं खलु बिभ्रति क्षितीन्द्राः ॥

चंदन झहरीले सर्पको पास रखता है, दीया अपने मस्तक पर काजल धारण करता है, चंद्र को भी कलंक है । वैसे ही राजा दुष्ट को पास रखता है ।

  • अमरैरमृतं न पीतमब्धेः न च हालाहलमुल्बणं हरेण ।
  • विधिना निहितं खलस्य वाचि द्वयमेतत् बहिरेकमन्तरान्यत् ॥

सागर में से देवों ने अमृत न पीया, शंकरने भयंकर झहर न पीया; वह अमृत और झहर ब्रह्मा ने दुष्टकी वाणी में रखा – एक बाहर, एक अंदर ।

दुर्जन पर संस्कृत श्लोक हिंदी में Top Sanskrit Shlok
  • अहमेव गुरुः सुदारुणानामिति हालाहल मा स्म तात दृप्यः ।
  • ननु सन्ति भवादृशानि भूयो भुवनेस्मिन् वचनानि दुर्जनानाम् ॥

हे हलाहल (विष) ! मैं भय़ंकर में श्रेष्ठ हूँ एसा घमंड न करना । इस जगत में तुज से भी भयंकर दुर्जन के वचन है ।

  • विषधरतोऽप्यति विषमः ख़लः इति न मृषा वदन्ति विद्वांसः ।
  • यदयं नकुलद्वेषी स कुलद्वेषी पुनः पिशुनः ॥

दुष्ट मानव सर्प से भी ज़ादा भयंकर है, एसा विद्वान सही कहते हैं । सर्प चाहे नकुल (नोयला) द्वेषी है, फिर भी कुलका द्वेष नहीं करते, लेकिन दुष्ट तो कुल का भी द्वेष करते हैं ।

  • त्यकत्वापि निजप्राणान् परहितविध्नं खलः करोत्येव ।
  • कवले पतिता सद्यो वमयति खलु मक्षिकाऽन्नभोक्तारम् ॥

अपने प्राण त्याग कर भी दुष्ट मानव दूसरे को विध्नरुप बनता है । अनाज के निवाले में पडी मख्खी अनाज खानेवाले को उल्टी कराती है ।

  • रविरपि न दहति तादृग् यावत् संदहति वालिका निकरः ।
  • अन्यस्माल्लब्धपदः नीचः प्रायेण दुःसहो भवति ॥

रेती के कण जितना जलाते हैं उतना सूर्य भी नही जलाता ! दूसरे के पास से उच्च पद पानेवाला नीच सदैव दुःसह्य होता है ।

  • दुर्जनः सुजनीकर्तु यत्नेनापि न शक्यते ।
  • संस्कारेणापि लशुनं कः सुगन्धीकरिष्यति ॥

दुर्जन को सज्जन बनाना शक्य नहीं है । संस्कार देने से लसून को कौन सुगंधित कर सकता है ?

  • मुखं पद्मदलाकारं वाणी चन्दनशीतला ।
  • ह्रदयं क्रोधसंयुक़्तं त्रिविधं धूर्तलक्षणम् ॥

मुख पद्मदल के आकार का, वाणी चंदन जैसी शीतल, और ह्रदय क्रोध से भरा हुआ – ये तीन धूर्त के लक्षण हैं ।

  • स्नेहेन भूतिदानेन कृतः स्वच्छोऽपि दुर्जनः ।
  • दर्पण्श्र्चान्तिके तिष्ठन् करोत्येकमपि द्विधा ॥

स्नेह से और उन्नति करने के बावजुद दुर्जन, और तेल व भस्म से स्वच्छ करने के बावजुद दर्पण, पास रहनेवाले को एक में से दो कर देते हैं (छिन्न भिन्न कर देता हैं) ।

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